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Abstract
प्रस्तुत शोधकार्य श्मीमांसा और न्याय.वैशेषिक में धर्म का स्वरूपश् में प्रथम मीमांसा दर्शन में विवेचित धर्म के स्वरूप को बतलाया गया। मीमांसक क्रिया प्रवर्त्तक वेदवाक्यों ;चोदनाद्ध से लक्षित विषय ;यागए दानद्ध आदि को धर्म मानते हैंए जो मनुष्य को परम कल्याण मोक्ष की ओर प्रवृत्त करता है। यहाँ चोदना ;भावनाए प्रवर्त्तनाए क्रियाप्रवर्तक वेदवाक्योंद्ध का बहुत महत्त्व है। धर्म के प्रमाण भूत वेद का प्रामाण्य स्वतः सिद्ध कियाए जिसे अन्य प्रमाणों की आवश्यकता नहीं होतीए क्योंकि वेद अपौरुषेयए अनादिए अनन्त और नित्य हैए वहाँ भ्रम और लिप्सा की जगह नहीं है। इस दर्शन का प्रारम्भ ही धर्मजिज्ञासा की प्रतिज्ञा से होता है।