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European Journal of Business &

Social Sciences

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ISSN: 2235-767X

Volume 07 Issue 04

April 2019

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॥ मीमाांसा तथा न्याय-वैशेषिक में धमम का स्वरूप ॥

अषिल कु मार आयम

सांस्कृ त एवां प्राच्यषवद्या अध्ययि सांस्थाि

जवाहरलाल िेहरू षवश्वषवद्यालय, िई दिल्ली

Mo.- 9968908440

E-mail-aryaanilshastri@gmail.com

शोधसाराांश - प्रस्तुत शोधकायम“मीमाांसा और न्याय-वैशेषिक मेंधममका स्वरूप” मेंप्रथम मीमाांसा िशमि में

षववेषित धममकेस्वरूप को बतलाया गया। मीमाांसक दिया प्रवर्त्मक वेिवाक्यों (िोििा) सेलषित षविय (याग,

िाि) आदि को धमममाितेहैं, जो मिुष्य को परम कल्याण मोि की ओर प्रवृर्त् करता है। यहााँिोििा (भाविा,

प्रवर्त्मिा, दियाप्रवतमक वेिवाक्यों) का बहुत महत्त्व है। धममकेप्रमाण भूत वेि का प्रामाण्य स्वतः षसद्ध दकया,

षजसेअन्य प्रमाणों की आवश्यकता िहीं होती, क्योंदक वेि अपौरुिेय, अिादि, अिन्त और षित्य है, वहााँभ्रम

और षलप्सा की जगह िहीं है। इस िशमि का प्रारम्भ ही धममषजज्ञासा की प्रषतज्ञा सेहोता है।

वैशेषिक िशमि का प्रारम्भ भी धममव्याख्या की प्रषतज्ञा सेहोता है। इिके मत मेंअभ्युिय (लौदकक

कल्याण) और षिःश्रेयस (परम कल्याण) की षसषद्ध, षजससेहो वह धर्म है। मीमाांसा की भााँषत इन्होिेंवेि के

प्रामाण्य को स्वतः षसद्ध दकया है, परन्तुवैशेषिक वेि को ईश्वरोक्त माितेहै। ईश्वर सवमज्ञ है, अतः उसका ज्ञाि

वेि भ्रम आदि िुगुमणों सेरषहत, इसषलए वेि का प्रामाण्य स्वतः षसद्ध दकया। वैशेषिक पिाथों मेंगुण केअन्तर्गत

धममको रखतेहै,जो आत्मा का षवशेि गुण है। वैशेषिक धममऔर अधममको अिृष्ट माितेकरतेहैं। वैशेषिकोंके मत

मेंजो अिृष्ट है, उसी को मीमाांसक अपूवमकेरूप स्वीकार करतेहैं।वैशेषिक केसमाि तन्र न्यायिशमि केप्रारम्भ

धमम षवियक षविारों पर ििाम न्यूि प्राप्त होती है। परन्तुषवकास की धारा मेंयेिोिों एकिूसरे की

षविारधारा सेसहमत होतेहै। न्याय की प्रमाण मीमाांसा को वैशेषिकों िेऔर वैशेषिकों की पिाथममीमाांसा को

न्याय िेस्वीकार दकया।

न्यायिशमि भी वैशेषिकों की तरह गुण केअन्तगमत धममको रखतेहैं, जो आत्मा का षवशेि गुण है। िव्य

न्याय मेंधमम, जो द्रव्यों का गुण इसकी ििामबहुत आती है। धममजो रहता है, षजसेधारण दकया जाय जो

षवद्यमाि रहता है। उसेधममकहतेहै। धममकेजाषत तथा उपाषध िो भेि दकये।षजसेधारण दकया जाय यह धमम

का आिारपरक अथमहै। जो रहता है, षवद्यमाि है, वह धममहै, जो द्रव्यों मेंरहिेवाला गुण है, इसी अथममेंयहााँ

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धममप्रयुक्त है। इस प्रकार हम िेखतेहैंदक प्रािीि काल सेसांस्कृ त वाङ्मय मेंधममकेअथममेंपररवर्त्मि प्राप्त होता

है।

॥ शोधपर ॥

मैंकौि हाँ? कहााँसेआया हाँ? इस िृश्यमाि जगत का स्वरूप क्या है? इसकी उत्पषर्त्

दकसिेकी है? इस सृषष्ट का आदिकारण क्या है? हमेंकौि-कौि सेकायमकरिेिाषहये? जीवि

को ठीक सेयापि करिेकेषलयेसुन्िरतम मागम क्या है? इस प्रकार के प्रश्नों का समुषित

समाधाि करिा िशमि का प्रधाि लक्ष्य होता है। यह ‘िशमि’ शब्ि “िृषशर प्रेिणे”

1 धातुसे‘ल्युट्’

2

प्रत्यय करिेपर षिष्पन्न होता है- ‘िृश्यतेअिेि इषत िशमिम्’ अथामत् वस्तुओं के सत्यभूत

ताषत्त्वक स्वरूप का ज्ञाि करािेवालेशास्त्रों को िशमि कहतेहैं।

िशमि मेंमुख्य रूप सेतत्त्व का स्वरूप, ज्ञाि, ज्ञाि के साधि, ज्ञाि की प्रमाषणकता

इत्यादि और आिार केषवषभन्न षबन्िुजैसेकमम, कममफल, कममस्वातन््य आदि का अध्ययि दकया

जाता है। इिका वगीकरण िो प्रकार सेदकया गया है- आषस्तक3 एवां िाषस्तक4 िशमि। जो िशमि

वेिों को प्रमाण माितेहैं, वेआषस्तक तथा जो वेिों को प्रमाण िहीं माितेहैं, वेिाषस्तक िशमि

स्वीकृत हैं। आषस्तक िशमिों मेंन्याय, वैशेषिक, साांख्य, योग, मीमाांसा तथा वेिान्त और िाषस्तक

िशमिों में िावामक, जैि तथा बौद्ध आदि िशमिों का अन्तभामव दकया गया है। अन्यर

सवमिशमिसङ्ग्रह रन्थ मेंमाधवािायमिेसोलह िशमिों का षववेिि दकया है।

धमम के अथम में पररवतमि –

1 धातुपाठ, भ्वादि०, धा० ७१४

2 “करणाषधकरणयोश्च”। अष्टाध्यायी, ३/३/११७

3 ‘अषस्त वेिेमषतयमस्य’ - अषस्त + ठक्“अषस्तिाषस्तदिष्टां मषतः”। वहीं, ४/४/६०

4 ‘िाषस्त वेिेमषतयमस्य’ - िाषस्त + ठक्“अषस्तिाषस्तदिष्टां मषतः”। वहीं, ४/४/६०

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सभ्यता केआदिकाल सेही धमम5 केषविय मेंििामहोती रही है। वैदिककाल सेवतममाि

समय तक धममशब्ि का अथमसमयािुसार पररवर्तमत होता रहा है। ऋग्वेि केपुरुि सूक्त मेंधमम

पि केषविय मेंकहा गया है- “यज्ञेि यज्ञमयजन्त िेवास्ताषि धमामषण प्रथमान्यासि्”

6 अथामत्

िेवताओं िेयज्ञ केद्वारा यजिीय पुरुि का अिमि दकया, वेअिमि ही सांसार केप्रथम धममथे।

ऋग्वेि की जैसेयजुवेि आदि वेिों मेंभी धममषवियक वणमि प्राप्त होतेहैं। ब्राह्मण, उपषििि्,

धममसूर, स्मृषत, रामायण, महाभारत आदि रन्थों मेंभी धममषवियक ििाम षवद्यमाि है।

महाभारत केकणमपवममेंधममकेषविय मेंकहा है-

“धारणाि् धममषमत्याहुधममो धारयते प्रजाः।

यः स्याि् धारणसांयुक्तः स धमम इषत षिश्चयः”॥7

कालान्तर मेंधममशब्ि केसाथ िशमि जुड़ गया है, भारतीय िशमि मेंमोि प्राषप्त को परम

लक्ष्य स्वीकार दकया गया है। मोि प्राषप्त केषलयेबतायेगयेजप, तप, उपासिा, भषक्त, योगादि

अिेक साधि हैं, परन्तुवास्तषवक ज्ञाि प्राप्त कर आत्मा केअषन्तम लक्ष्य मोि प्राषप्त केषलयेधमम

अत्यन्त आवश्यक है। मीमाांसा और वैशेषिक िशमि का प्रारम्भ तो धमम की व्याख्या सेहोता है,

जो इिकेमत मेंमोि प्राषप्त का कारण है। न्यायसूर मेंधममषवियक ििामका अभाव है, परन्तु

परवती िव्यिैयाषयकों िेधममषवियक ििामकी है।

मीमाांसा में धमम का स्वरूप -

“मातुां षविारषयतुषमच्छा मीमाांसा”

8 जहााँपर साङ्ग्गोपाङ्ग्ग धममका षविार दकया जाता

है, उसेमीमाांसा कहतेहैं। इसेवेिों का तार्कमक षवश्लेिण करिेसे‘वेिषविारशास्त्र’, वेिों के

5 “धृञ् धारणे”। धातुपाठ, भ्वादि०, धा० ६४१, धृञ्+मि् “अर्तमस्तुसुहुसृधृषििुभायावापदियषििीभ्यो मि्”। उणादिकोि, १/१३७

6 ऋग्वेि, १०/९०/१६

7 महाभारत, कणमपवम, ६९/५८

8 “माि पूजायाम्” (भ्वादि०) “माि षविारे” (िुरादि०) इि धातुसे‘सि्’ प्रत्यय करकेमीमाांसा शब्ि का षिमामण दकया है।